जन्नत-ए-नवोदय

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जन्नत-ए-नवोदय

इस जहां में, इक जहां है ,
जिसे कुछ लोग जन्नत कहते हैं,
तो कुछ लोग जीने की जीनत कहते हैं ,
कुछ मां का आंचल, तो कुछ पिता की
छाया कहते हैं,
कुछ मंदिर-सा पावन तो कुछ मस्जिद
का सजदा बताते हैं, कुछ जीने की वजह तो कुछ जिंदगी ही
कह देते हैं,
और
हम जैसे शागिर्द इसे जन्नत-ए-नवोदय
कहते हैं ||
कुछ चंद बड़बोले पूछते हैं कि ,
“दिया ही क्या तुम्हें इन चारदीवारी ने”
जरा गौर फरमाइएगा……
“खुले आसमां तले आशियाना होगा ,
जरूर जनाब तुम्हारा,
पर हमने तो चारदीवारी में कैद जन्नत
देखी है”
कुछ फूलों जैसी यारी, कुछ लहजे खुशबू
जैसे देखे हैं, बेशक बहुत कमीने यार दिए थे,
पर दिन की रौनक वही कमीने थे |
कभी जिनके बगैर न सुबह होती थी,
वो यार दिए हैं,
साथ खड़े जो चाय नाश्ते की पंक्ति की
याद दी है,
मौज-मस्ती कक्षा में जिनके साथ,
बेंच बिन बजे न रहती थी, वो लम्हे दिए
हैं
और तुम पूछते हो दिया ही क्या इन चार
दिवारी ने ….???
कुछ हीर रांझा और लैला मजनू जैसे
प्यार दिए,
जिंदगी की डगर में हमसफर जैसे
मुसाफिर दिए ॥
और कुछ अनकहे,अनसुलझे रिश्ते दिए ।
वो होली के रंगों की छाप,
राखी का पावन धागा ,
नवरात्रों के डांडिया की धूम,
और तो वैलेंटाइन पर कुछ यारों की
रांझो-सी बातें
और तुम पूछते हो ….. ?
साथ बैठकर जिनके,
बिन खाए एक थाली में भूख खत्म न
होती थी,
साथ जिनके हर खेल में हार,जीत होती
थी,
हो जाए बीमार अगर,तो देखभाल घर
जैसी होती थी,
ऐसी अनूठी मोतियों की सीप-सी यारी
दी है |
और धड़कने तेज हो जाती थी ,
जब प्रयोगशाला में साथ वो खड़ी हो
जा ती थी, उसका यू खिड़की से देखना,
और पलकों को झुकाना,
वो दिसंबर की ठंडी रातें,
वो बिन मौसम बारिश और उस बारिश
में प्यास बुझाने वाली थ्योरी,
और वो अनकही,अनछुई दिली तमन्नाओं
का पूरा हो जाना ॥
इन सबके बीच वो बेपरवाह राते,
रात को बैठकर भूतों की बातें,
और स्वाद चुराई हुई रोटी का,चुपके से
बनी सब्जी का,
वो आधी रातों में पराठो की खुशबू,
और खेला जो रातों में क्रिकेट उसका
मंजर,
वो पीछे वाली कॉलेज की गलियां,
और कुत्तों का कहर,
बाउंड्री वॉल पर बीती शामें ॥
और सच कहूं तो मिट्टी की इन चार
दीवारी ने जिंदगी की तासीर दे डाली !!
और तुम पूछते हो…..??
मेरी हर बात में किस्सा बन कर
आती है वो,
किसी अनजान शहर में अपनी पहचान
बताता हूं जिससे,
और सारी खुशियों को एक लफ्ज़ में
समेटा पाता हूं,
जब कहीं नवोदय लिखा पाता हूं !!
और तुम पूछते हो…….??
कुछ यादों की हसरतें,
कुछ यारों का कारवां,
खामोशी के इन पन्नों पर बचपन की यादें
गुमनाम इन राहों में एक नाम दिया है।
और सच कहूं तो मीत-प्रीत से बंधी डोर
और गुलशन की कलियों-सा परिवार
दिया है !!
कुछ मंदिर-सा पावन तो कुछ मस्जिद
का सजदा बताते हैं, कुछ जीने की वजह तो कुछ जिंदगी ही
कह देते हैं,
और
हम जैसे शागिर्द इसे जन्नत-ए-नवोदय
कहते हैं ||

-रौनक यादव
Ronak Yadav JNVFamily.In

Ronak Yadav

Alumni Of JNV Banswara
Batch :- 2012-2019
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